


मानिकपुर खदान विस्तार से पहले भू-विस्थापितों का सवाल—दशकों पुराने मुआवजा, रोजगार और R&R के लंबित मामलों का कब होगा समाधान?
25 सितंबर की जनसुनवाई से पहले 8 गांवों के ग्रामीण धरने पर; 1963-64 में अधिग्रहित जमीन के मामलों से लेकर रोजगार, पुनर्वास और मूलभूत सुविधाओं की मांग
कोरबा। एसईसीएल की मानिकपुर ओपनकास्ट परियोजना के विस्तार को लेकर 25 सितंबर 2026 को प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई से पहले भू-विस्थापित ग्रामीणों ने अपनी वर्षों पुरानी मांगों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। प्रभावित 8 गांवों के ग्रामीण जीएम कार्यालय के सामने धरने पर बैठे हैं। ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में लंबित मुआवजा, भूमि के बदले रोजगार, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन (R&R), छूटे हुए प्रभावित परिवारों का पुनः सर्वेक्षण तथा प्रभावित क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था शामिल है। 25 सितंबर की जनसुनवाई की तारीख पहले 21 अगस्त निर्धारित थी, जिसे विरोध और लंबित मुद्दों के बीच स्थगित किया गया था।
ग्रामीणों का कहना है कि मानिकपुर क्षेत्र में 1963-64 में अनेक किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। उनके अनुसार, ऐसे कई प्रभावित परिवार आज भी मुआवजा और जमीन के बदले रोजगार जैसे मामलों के निराकरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका सवाल है कि जिस जमीन के आधार पर वर्षों से कोयला उत्पादन हो रहा है, उसी जमीन के मूल प्रभावित परिवारों के लंबित अधिकार अब तक पूरी तरह क्यों नहीं सुलझे। 1963-64 में अधिग्रहित जमीन के मुआवजा और रोजगार संबंधी मांगों का उल्लेख हाल की रिपोर्टों में भी सामने आया है।
मुआवजा, रोजगार और R&R प्रमुख मुद्दे
ग्रामीणों का कहना है कि भू-विस्थापन केवल जमीन से वंचित होने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे परिवार की आजीविका, खेती, मकान, सामाजिक परिवेश और बच्चों का भविष्य भी प्रभावित होता है। इसलिए मुआवजे के साथ प्रभावित परिवारों के पात्र युवाओं को रोजगार तथा सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था जरूरी है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रभावित परिवारों के पात्र युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने की प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध हो। उनका आरोप है कि स्थायी रोजगार के लंबित मामलों के समाधान से पहले निजी ठेका कंपनियों के माध्यम से रोजगार की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि 18 सितंबर से धरना शुरू होने के बाद यह प्रक्रिया दिखाई दे रही है, लेकिन अभी तक किसी प्रभावित को नियुक्ति पत्र नहीं मिला है, इसलिए उन्हें आशंका है कि यह प्रक्रिया वास्तविक समाधान की दिशा में है या केवल दिखावे तक सीमित है। इस संबंध में स्वतंत्र रूप से नियुक्ति की स्थिति की पुष्टि नहीं हुई है।
निजी कंपनियों में काम कर रहे या रोजगार की तलाश कर रहे प्रभावित युवाओं एवं वाहन चालकों ने सुरक्षा राशि, लाइसेंस/दस्तावेज और अन्य शर्तों को लेकर भी शिकायतें उठाई हैं। हाल में एक निजी परिवहन कंपनी पर भू-विस्थापित ड्राइवरों से एक लाख रुपये की सुरक्षा राशि लेने और लाइसेंस बंधक रखने के आरोपों की रिपोर्ट सामने आई थी।
छूटे परिवारों का सर्वे और पुनर्वास की मांग
ग्रामीणों की मांग है कि छूटे हुए मकानों, परिवारों और पात्र प्रभावितों का पुनः सर्वेक्षण कराया जाए, ताकि रिकॉर्ड या सर्वे की कमी के कारण कोई वास्तविक प्रभावित अपने अधिकार से वंचित न रहे। उनका कहना है कि R&R केवल कागजी प्रक्रिया नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रभावित परिवारों को मकान, आजीविका और आवश्यक सुविधाओं से जोड़ने की स्पष्ट कार्ययोजना सामने आनी चाहिए।
ग्रामीण यह भी चाहते हैं कि भिलाईखुर्द, दर्रीपारा और आसपास के क्षेत्रों में स्कूल भवन, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, चांपा मुख्य मार्ग स्थित बजरंग चौक स्वास्थ्य केंद्र, मुक्तिधाम तथा निवासरत मोहल्लेवासियों के लिए सड़क जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जाए।
राखड़ से प्रदूषण का भी उठाया मुद्दा
ग्रामीणों ने मानिकपुर की बंद खदान के समतलीकरण के लिए राखड़ के उपयोग को लेकर भी गंभीर आपत्तियां उठाई हैं। उनका आरोप है कि राखड़ भराव के बजाय वहां राखड़ का बड़ा ढेर बन गया है। तेज हवा और आंधी के दौरान राखड़ के गुबार से आसपास का क्षेत्र प्रभावित होता है, जिससे स्वास्थ्य, खेती और कोरबा-चांपा मुख्य मार्ग पर असर पड़ने की आशंका है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि राखड़ के बहाव से हसदेव नदी के जल के प्रदूषित होने का खतरा है। इन पर्यावरणीय आरोपों की स्वतंत्र जांच और वैज्ञानिक परीक्षण की मांग भी ग्रामीणों के मुद्दों में शामिल है।
पहले समाधान, फिर जनसुनवाई की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि वे खदान विस्तार या विकास के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना है कि विकास के साथ उन परिवारों के अधिकारों का संरक्षण भी जरूरी है, जिन्होंने परियोजना के लिए अपनी जमीन और आजीविका गंवाई है। वे चाहते हैं कि एसईसीएल प्रबंधन, जिला प्रशासन और प्रभावित ग्रामीणों के बीच औपचारिक बैठक आयोजित कर प्रत्येक प्रभावित परिवार के मामले की सूची तैयार की जाए और लंबित मामलों के निराकरण की समयसीमा तय की जाए।
25 सितंबर की जनसुनवाई से पहले ग्रामीणों की मुख्य मांग है कि मुआवजा, रोजगार और R&R के लंबित मामलों पर लिखित एवं समयबद्ध कार्ययोजना सामने रखी जाए। पूर्व में भी प्रभावित ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर जनसुनवाई से पहले लंबित मांगों के निराकरण की मांग की थी।
ग्रामीणों का कहना है—दशकों पहले जिन परिवारों की जमीन लेकर विकास की नींव रखी गई, आज उन्हीं परिवारों को अपने अधिकारों के लिए धरने पर बैठना पड़ रहा है। सवाल खदान के विस्तार का नहीं, बल्कि यह है कि विस्तार से पहले पुराने प्रभावित परिवारों के लंबित अधिकारों का समाधान कब और किस समयसीमा में होगा।









